काश मैं तुम्हे बता पाती,
काश तुम मुझे समझ पाते।
कुछ वक़्त और मैं जुटा पाती ,
कुछ बात और तुम बढ़ा पाते।।
जाने क्यों ; तुम बिन थोड़ी खोयी सी हुँ,
नींद बिन मैं कुछ ना- सोई सी हुँ।
दिन कब निकला ना पता ना खबर ,
सदियों से मैं शायद य़ू ही कुछ सोई हुँ।।
एक दर्द है जो सीने से निकल के उभरता है ,
कुछ अल्फाज़ था जो लबों से लिपट के फिर खोया है।
क्या रात है ये जो अकेली जलके बुझ रही है शोलों में,
क्या चाँद हे ये जो मायूस जाने कितनी रात रोया है।।
हो सके तो बचा लेना ,
बनती बिगड़ती ये दास्ताँ।
काश मैं तुम्हे कुछ समझ पाती ,
काश तुम मुझे कुछ बता पाते।।
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